त्रिभंगी : टेढ़ी मेढ़ी क्रेज़ी (फिल्म 2021) का अ-निर्णायक स्त्री विमर्श

अगर यह सवाल किया जाए कि स्त्री के सच्चे मुद्दों को केंद्र में रखकर, स्त्री के द्वारा लिखित और निर्देशित फिल्में कितनी हैं और वैसी कितनी फिल्में हैं जो स्त्री मुद्दों को सच्चाई से बयान करती है भारत में तो इसका सवाल का जो जवाब मिलेगा वो है – बहुत कम और शायद एकदम न के बराबर। इसीलिए यह फिल्म त्रिभंगी : टेढ़ी मेढ़ी क्रेज़ी बहुत ही ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इसके केंद्र में स्त्री की तीन पीढियां हैं और जिसका लेखन और निर्देशन भी स्त्री ने ही किया है। अब संस्कृति और संस्कार के नाम पर पुरुषसत्तात्मक मानसिकता से गहरे तक पीड़ित दिमाग, इस फिल्म, इसके कथ्य और इसके कहने के अंदाज़ से सहमत होता है या असहमत, इस बात से इस फिल्म को ठीक उसी प्रकार कोई फ़र्क नहीं पड़ता, जिस प्रकार तमाम झूठ, फरेब और भ्रम के बीच सच को कोई फ़र्क नहीं पड़ता; चाहे सच बहुमत में हो या अल्पमत में। ज़रूरी मुद्दे उठाते हुए फिल्म का फिल्म होना भी एक बेहद आवश्यक शर्त है, यह फिल्म इस बात पर भी खरी उतरती है। वैसे यह बात सर्वज्ञात है कि “सत्यमेव जयते” का नारा चाहे जितना भी लगा लिया जाए, सच हमेशा अल्पमत में ही रहा है और ज़हर का प्याला हमेशा उसी के ज़िम्मे आता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि स्त्री द्वारा स्त्री की कथा जब कहीं जाएगी तो इतनी आसानी से वो भारतीय समाज के लिए सुपाच्य नहीं होगी। यह फिल्म भी शायद थोड़ा पुरुषवादी दिल-दिमाग का हाज़मा ख़राब करे, करना भी चाहिए।

फिल्म त्रिभंगी को देखते हुए थोड़ी सी याद बर्गमैन की अद्भुत फिल्म परसोना की भी आती है लेकिन बस थोड़ी सी ही। फिल्म त्रिभंगी : टेढ़ी मेढ़ी क्रेज़ी प्रसिद्द अभिनेत्री रेणुका साहने द्वारा लिखित और निर्देशित फिल्म है जो एक परिवार के प्रत्यक्ष रूप से तीन पीढ़ियों की कथा सही सुर, ताल, लय और आलेख के साथ प्रस्तुत करती है। इस फिल्म के पार्श्वसंगीत को भी गौर से सुनने की ज़रूरत है जो कथा के साथ अपना एक अलग ही जानदार, अर्थवान और महत्वपूर्ण प्रभाव उत्पन्न करता चलता है।

फिल्म त्रिभंगी : टेढ़ी मेढ़ी क्रेज़ी की तीन पीढियां नयनतारा, अनुराधा और माशा है और तीनों एक दुसरे से जुड़े हुए भी तीनों का वजूद एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं। नयनतारा एक लेखिका है, जो किसी भी क़ीमत पर लिखे बिना नहीं रह सकती है और जब वो लिखती है तो बाक़ी सब दुनियादारी भूल जाती है। रचनात्मक इंसान की इस स्थिति को समझने की जगह इस दुनिया में थोड़ा कम ही है। वो शादीशुदा है और उसके दो बच्चे अनुराधा और रबिन्द्रो की मां भी है। फिल्म शुरू होती है कि एक लेखक मिलन (कुणाल राय कपूर) नयनतारा की आत्मकथा लिखना चाहता है क्योंकि नयनतारा अब बीमारी की वजह से लिख नहीं सकती। इसके लिए नयनतारा लेखक से खुलके और बिंदास होकर बात करती है और लेखक उसे अपने कैमरे से रिकॉर्ड करता है। इसी क्रम में पता चलता है कि नयनतारा का पति तो उसके लिखने के पक्ष में थे लेकिन उसकी सास चाहती है कि वो बाक़ी बहुओं की तरह घर के कामकाज देखें। तनाव बढ़ता है और एक दिन नयनतारा बच्चों को लेकर घर छोड़ देती है और फिर वो पूरा जीवन अपने हिसाब से जीती है। यह सबकुछ बताते बताते नयनतारा बेहोश हो जाती है कोमा में चली जाती है लेकिन उससे पहले वो यह बात ज़रूर कहती है कि उसकी आत्मकथा उसके बच्चों की सच्ची प्रतिक्रिया के बगैर पूरी नहीं हो सकती।

त्रिभंगी : टेढ़ी मेढ़ी क्रेज़ी (फिल्म 2021)

नयनतारा की बेटी अनुराधा अब एक प्रसिद्ध अभिनेत्री और ओडीसी नृत्यांगना है और अपनी मां से घनघोर नफ़रत करती है। वो बेलाग और बेख़ौफ़ है और शादी और पारिवारिक ज़िन्दगी को “सामजिक आतंकवाद” की संज्ञा से संबोधित करती है। वो साफ़ कहती है – एकसमागम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। वो मर्दों के साथ खुले रिश्ते में रहती है और इस प्रकार उसके जीवन में मर्द आते-जाते रहते हैं। एक विदेशी से वो गर्भवती होती है और माशा को जन्म देती है। इधर उसकी मां नयनतारा भी अब एक बड़े पेंटर के साथ रह रही होती है। उसकी बेटी माशा एकदम अलग है और किसी पारंपरिक लड़की की तरह परिवार के साथ रहना चाहती है इसलिए वो शादी भी एक ऐसे परिवार में करती है जो परम्परिक है और वीडियोकॉल तक में सिर पर पल्लू रखना नहीं भूलती। इन तीनों स्त्रियों में एक बात जो कॉमन है वो यह कि उनके निर्णय निश्चित रूप से एक दुसरे को प्रभावित करते हैं लेकिन वो अपने निर्णय एक दूसरे के ऊपर थोपती नहीं हैं और ना ही एक दूसरे के निर्णय को प्रभावित करने की चेष्टा ही करती हैं, चाहे वो निर्णय उनको पसंद हो या नापसंद हो। बाक़ी एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से अलग सोचती है और दोनों के बीच टकराहट का होना भी एक स्वाभाविक सी प्रक्रिया है। इन सबके और बहुत कुछ और के बीच कथा नैरेटिव ढंग से पूरी होती है और साथ ही पूरी होती है नयनतारा की आत्मकथा भी। यह उपरी तौर पर फिल्म की कथा है बाक़ी विस्तृत तौर पर इसके विभिन्न उपकथा और एक पात्र का दूसरे पात्र के साथ के अंतर्संबंधों की यात्रा करने के लिए आपको फिल्म देखनी ही पड़ेगी। फिल्म पारिवारिक हिंसा, विभिन्न प्रकार के उत्पीडन और अपने वजूद की तलाश की कथा भी अपने साथ लेकर चलती है। वही उसका एक हिस्सा यह भी है कि नयनतारा का बेटा रबिन्द्रो (वैभव तत्वावादी) अध्यात्म में शांति की तलाश करता है, बिना उसे पलायनवाद माने। नयनतारा की भूमिका तन्वी आज़मी, अनुराधा की भूमिका काजोल और माशा की भूमिका को मैथिली पालकर ने बेहतरीन अंदाज़ में निभाई है। तन्वी के चेहरे की कठोरता, काजोल का बेलौसपन और मैथिली की मासूमियत इस के चरित्र को एक ख़ास अंदाज़ देते हैं वहीं जवान नयनतारा के रूप में स्वेता मेहेंदल और किशोरी अनुराधा के रूप में श्वेता ने अपना काम बाख़ूबी अंजाम दिया है। यही होता है जब एक निर्देशक एकदम साफ़ होता है कि उसे क्या, कब और क्यों करना है। काजोल को इस फिल्म में देखकर आप भौंचक्के हो जाते हैं और उसकी स्वाभाविकता को देखकर उस फिल्म उद्योग को कोसने लगते हैं जिसके पास लड़कियों के लिए नाचने, गाने, हीरो से प्रेम करने और मैं तुलसी तेरे आंगन की गाने, या खून भरी मांग या फिर भगवान के लिए मुझे छोड़ दो जैसे स्टीरियोटाइप भूमिकाओं के सिवा और कुछ नहीं है और उस मानसिकता पर भी लानत भेजने से अपनेआप को नहीं रोक पाते जिसमें शादी के बाद लड़कियां घर में किसी मूर्ति की तरह सजा दी जाती हैं और इस चक्कर में कई बेहतरीन प्रतिभाएं घर बैठे-बैठे ज़ंग खाने को अभिशप्त हैं।

त्रिभंगी : टेढ़ी मेढ़ी क्रेज़ी (फिल्म 2021)

इसकी पूरी प्रक्रिया में चरित्र एक दूसरे को समझने की चेष्टा भी करते हैं और धीरे-धीरे उनको समझ में आता है कि किसी भी चीज़ के लिए किसी एक को पूरी तरह से ज़िम्मेदार मान लेनाउचित बात नहीं है क्योंकि हर स्थिति और परिस्थिति पर इंसान का वश नहीं चलता और कई ऐसी भी चीज़ें हो जाती है जो एक चरित्र को बहुत गहरे अर्थ में प्रभावित करती है लेकिन वहीं दूसरे चरित्र को उसका तनिक भी अंदाजा तक नहीं होता। वैसे इस फिल्म का सबसे कमज़ोर पक्ष यह कहा जा सकता है कि फिल्म परिवार नामक संस्था से भागने से शुरू होती है और उसी संस्था में पनाह पाकर ख़त्म होती है; मतलब नयनतारा भागती है, अनुराधा उसे चरम पर पहुंचाती है और मैथली पुनः स्टेबल, नॉर्मल फैमली के नाम पर उस परिवारवाद में वापस लौटने में ही अपनी भलाई देखती है, फिर उन तमाम संघर्षों का क्या हुआ। वैसे क़दम-क़दम पर व्याप्त सामाजिक दबावों से लड़ पाना हर किसी के वश की बात भी नहीं है। इस चक्कर में मैथिली इतनी कमज़ोर हो जाती है कि वो कसी भी क़ीमत पर नॉर्मल फैमिली के लिए तैयार हो जाती है।

फिल्म के इन तीनों चरित्रों को ओडिसी नृत्य की भाषा में परिभाषित करते हुए लेखक-निर्देशक अपने सबसे महत्वपूर्ण चरित्र अनुराधा में मुंह से कहलवाती हैं कि नयनतारा, अभंग है यानि अजीब है पर अकलमंद है, माशा – समभंग, एकदम संतुलित, अनुराधा – टेढ़ी, मेढ़ी, क्रेज़ी लेकिन सेक्सी त्रिभंग। मतलन कि यह अजीब से संतुलित तक की यात्रा है और यही मामला थोड़ा सा गड़बड़ हो जाता है लेकिन इस प्रक्रिया में स्त्री विमर्ष के बहुत सारे महत्वपूर्ण और बेहद आवश्यक मुद्दों पर बात हो जाती है, यह एक ज़्यादा ज़रूरी बात है लेकिन उससे भी ज़रूरी बात यह है कि यह फिल्म किसी भी स्थिति और चरित्र को लेकर कभी भी निर्णायक नहीं होती।


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पुंज प्रकाश
पुंज प्रकाश
Punj Prakash is active in the field of Theater since 1994, as Actor, Director, Writer, and Acting Trainer. He is the founder member of Patna based theatre group Dastak. He did a specialization in the subject of Acting from NSD, NewDelhi, and worked in the Repertory of NSD as an Actor from 2007 to 2012.

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